हार्ट अटैक या सीने में बार-बार दर्द की शिकायत लेकर जब मरीज़ हॉस्पिटल पहुंचते हैं, तो जांच के बाद अक्सर एक ही शब्द सुनने को मिलता है — एंजियोप्लास्टी। ज़्यादातर परिवार इस नाम से घबरा जाते हैं, क्योंकि उन्हें ठीक से पता नहीं होता कि यह प्रोसेस असल में है क्या, और क्यों ज़रूरी है। दिक्कत तब बढ़ती है जब सही जानकारी न होने की वजह से मरीज़ इलाज में देरी कर देते हैं। इस ब्लॉग में समझते हैं कि एंजियोप्लास्टी और स्टेंट सर्जरी कब की जाती है, इसका प्रोसेस क्या है, और इसके बाद ज़िंदगी कैसी होती है।
दिल की नसों में ब्लॉकेज क्यों होता है
समय के साथ दिल तक खून पहुंचाने वाली नसों (कोरोनरी आर्टरी) में कोलेस्ट्रॉल और फैट की परत जमने लगती है, जिसे प्लाक कहते हैं। यह प्लाक धीरे-धीरे नस को संकरा करता जाता है। जब यह ब्लॉकेज बहुत ज़्यादा हो जाए, या अचानक टूटकर नस को पूरी तरह बंद कर दे, तो दिल तक खून पहुंचना रुक जाता है — यही स्थिति हार्ट अटैक का कारण बनती है।
एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी में फर्क
बहुत से लोग इन दोनों को एक ही समझ लेते हैं, जबकि यह दो अलग चरण हैं। एंजियोग्राफी एक जांच है, जिसमें एक पतली ट्यूब (कैथेटर) के ज़रिए नस में डाई डालकर एक्स-रे पर देखा जाता है कि ब्लॉकेज कहां है और कितनी गंभीर है। अगर जांच में ब्लॉकेज गंभीर निकले, तो उसी प्रोसेस के दौरान या अलग से एंजियोप्लास्टी की जाती है, जिसमें उस ब्लॉकेज को खोला जाता है।
एंजियोप्लास्टी कब ज़रूरी हो जाती है
- हार्ट अटैक की स्थिति में, जब नस पूरी तरह ब्लॉक हो चुकी हो और तुरंत खून का प्रवाह बहाल करना ज़रूरी हो
- एंजियोग्राफी में गंभीर ब्लॉकेज पाए जाने पर — आमतौर पर जब किसी नस में 70% से ज़्यादा रुकावट हो
- सीने में बार-बार दर्द होना, जो दवाइयों से भी ठीक न हो रहा हो
- हल्की मेहनत करने पर भी सांस फूलना और सीने में दबाव महसूस होना
- टीएमटी या स्ट्रेस टेस्ट में दिल तक खून की सप्लाई में कमी दिखना
हर ब्लॉकेज में तुरंत एंजियोप्लास्टी की ज़रूरत नहीं होती — डॉक्टर ब्लॉकेज की जगह, गंभीरता और मरीज़ की समग्र स्थिति देखकर फैसला लेते हैं।
एंजियोप्लास्टी और स्टेंट लगाने का प्रोसेस
प्रोसेस शुरू होने से पहले मरीज़ को लोकल एनेस्थीसिया दिया जाता है, यानी मरीज़ पूरे समय होश में रहता है। इसके बाद कलाई या जांघ की नस के ज़रिए एक पतली ट्यूब (कैथेटर) दिल की नसों तक पहुंचाई जाती है। जहां ब्लॉकेज होता है, वहां एक छोटा गुब्बारा (बैलून) फुलाकर नस को चौड़ा किया जाता है, और फिर उस जगह पर एक छोटी मेटल ट्यूब — जिसे स्टेंट कहते हैं — लगा दी जाती है। यह स्टेंट नस को खुला बनाए रखता है, ताकि खून का प्रवाह सामान्य रूप से चलता रहे।
पूरा प्रोसेस आमतौर पर 30 मिनट से 1-2 घंटे के बीच पूरा हो जाता है, ब्लॉकेज की जटिलता के अनुसार समय घट-बढ़ सकता है।
एंजियोप्लास्टी के बाद रिकवरी कैसी होती है
ज़्यादातर मरीज़ों को 1-2 दिन हॉस्पिटल में निगरानी में रखा जाता है। जिस जगह से कैथेटर डाला गया था, वहां हल्की सूजन या दर्द हो सकता है, जो कुछ दिनों में ठीक हो जाता है। डिस्चार्ज के बाद डॉक्टर खून पतला करने की दवाइयां देते हैं, जिन्हें बताए गए समय तक नियमित रूप से लेना ज़रूरी होता है। ज़्यादातर मरीज़ एक हफ्ते के अंदर अपने रोज़मर्रा के काम दोबारा शुरू कर पाते हैं, हालांकि भारी मेहनत वाले काम से कुछ हफ्तों तक बचने की सलाह दी जाती है।
स्टेंट लगने के बाद क्या ज़िंदगी सामान्य हो जाती है
हां, स्टेंट लगने के बाद ज़्यादातर मरीज़ पूरी तरह सामान्य जीवन जी सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जोखिम पूरी तरह खत्म हो गया। दिल की सेहत बनाए रखने के लिए दवाइयां नियमित लेना, बीपी और शुगर को कंट्रोल में रखना, तला-भुना खाना कम करना, धूम्रपान से दूर रहना और नियमित हल्की एक्सरसाइज़ करना ज़रूरी रहता है। डॉक्टर द्वारा बताए गए फॉलो-अप शेड्यूल का पालन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इंश्योरेंस, TPA और आयुष्मान भारत सपोर्ट
एंजियोप्लास्टी जैसी प्रक्रिया को लेकर परिवार की सबसे बड़ी चिंता खर्च को लेकर होती है। अर्श सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में इसके लिए अलग इंश्योरेंस डेस्क काम करती है — ज़्यादातर हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों के लिए कैशलेस इलाज, TPA से सीधा तालमेल ताकि क्लेम अटके नहीं, और आयुष्मान भारत (PM-JAY) के तहत पात्र मरीज़ों का इलाज भी उपलब्ध है। इमरजेंसी में भी प्री-ऑथराइज़ेशन का काम तुरंत निपटाया जाता है।
अर्श सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल क्यों चुनें
अर्श सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की सुविधा मॉडर्न कैथ लैब के साथ 24×7 उपलब्ध है। अनुभवी कार्डियोलॉजी टीम, इमरजेंसी में तुरंत रिस्पॉन्स, और कैशलेस इंश्योरेंस-आयुष्मान भारत सपोर्ट के साथ, गया और मगध क्षेत्र के मरीज़ों को दिल की बीमारी का इलाज कराने के लिए दूसरे शहर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
नहीं, यह एक मिनिमली इनवेसिव प्रोसेस है, जिसमें सिर्फ कलाई या जांघ की नस में छोटा सा पंचर किया जाता है, बड़ा चीरा नहीं लगता।
ज़्यादातर मरीज़ 1-2 दिन में डिस्चार्ज हो जाते हैं और एक हफ्ते के अंदर सामान्य गतिविधियां शुरू कर सकते हैं, भारी काम से कुछ हफ्तों तक बचना चाहिए।
अगर बीपी, शुगर और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में न रखे जाएं, तो दूसरी जगह ब्लॉकेज बनने का खतरा रहता है। इसलिए नियमित फॉलो-अप और जीवनशैली में सुधार ज़रूरी है।
हां, अर्श सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल इसके लिए पहले से सूचीबद्ध है।

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